- नाटक के हर पात्र को सहजता, संवेदनशीलता और आत्मविश्वास के साथ मंच पर किया जीवंत
कानपुर। गणेश उत्सव के पवन पर्व में महाराष्ट्र मंडल के सौजन्य से दर्पण कानपुर संस्था ने नाटक ‘खाँचे’ के माध्यम से एक सामाजिक संदेश दिया। रघुनंदन त्रिवेदी की कहानी को मंच पर प्रस्तुत करना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, क्योंकि कहानी का मूल भाव मनुष्य के भीतर छिपी उन संवेदनाओं से जुड़ा है, जिन्हें शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं। निर्देशक अरु व्यास ने नाटक ‘खांचे’ के माध्यम से इस चुनौती को प्रभावशाली ढंग से स्वीकार किया और कहानी को दर्शकों के हृदय तक पहुंचाने में सफलता हासिल की।
नाटक आधुनिक जीवन की उस सच्चाई को उजागर करता है, जहां व्यक्ति सब कुछ पाने की चाह में अपने रिश्तों और भावनाओं को अनदेखा करता चला जाता है। समय बीतता है और अंततः वही जीवन, जो कभी उपलब्धियों की दौड़ में व्यस्त था, पीछे छूटे पलों की स्मृतियों में सिमटने लगता है। निर्देशक ने कहानी के भावनात्मक पक्ष को बिना अनावश्यक आडंबर के मंच पर उभारा। प्रस्तुति में संवेदना और सहजता का सुंदर संतुलन दिखाई दिया। यही कारण रहा कि दर्शक पात्रों और परिस्थितियों से सहज रूप से जुड़ते चले गए।
नाटक में विनायक की तीन अवस्थाओं की भूमिका क्रमशः सौरभ परमार, वैभव मिश्रा, अग्रज पाण्डेय ने सशक्त भूमिका निभाई। ख्वाहिश के किरदार में शांति गुप्ता ने प्रभावशाली अभिनय किया। शिक्षक की भूमिका में योगेंद्र श्रीवास्तव तथा टीनू के रूप में प्रशांत त्रिपाठी ने अपने अभिनय से पात्रों को सजीव बना दिया। दोस्तों की भूमिका में अक्षय, इमैनुएल सिंह, रघुवंशी, रवि, अजीत पाल, देव पंडित, वैभव द्विवेदी एवं अनुभव मिश्रा ने अपने सहज और जीवंत अभिनय से नाटक में ऊर्जा का संचार किया। वहीं हवलदार की भूमिका में अनिल गुप्ता ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया।
























